हाथ ओन्का चूमें तो मैं दस्त-ए-बोसी सुब्ह वाह क्या दस्त-ए-मशाइख़ यद-ए-बैज़ा हो गया

“When at dawn I bowed to kiss their hand in humble devotion, / Ah, how that revered elder's palm turned into Moses' miraculous hand of light!”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

जब मैं सुबह आदर से उनका हाथ चूमता हूँ, तो क्या ख़ूब कि उस बुज़ुर्ग का हाथ हज़रत मूसा के चमत्कारिक रौशन हाथ (यद-ए-बैज़ा) की तरह चमक उठा।

विस्तार

इस शेर में शायर ने अक़ीदत और रूहानियत के खूबसूरत मंज़र को पेश किया है। सुबह के वक्त जब किसी बुजुर्ग या महबूब के हाथों का बोसा लिया गया, तो वह हाथ हज़रत मूसा के मो'जिज़े 'यद-ए-बैज़ा' यानी चमकते हुए रोशन हाथ की तरह दमक उठा। यहाँ अदब और मोहब्बत का ऐसा जादू दिखाया गया है, जहाँ एहतराम का एक छोटा सा लम्हा भी इलाही नूर और बरकत से भर जाता है।

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