वो मस्त मय-ख़्वार इधर को आया, मगर ये लालच है उस को लाया
कि मेरे ख़ूँ को शराब-ए-गुलगूँ, दिल ओ जिगर को कबाब देखा
— शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
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