वो जो नक़्श-ए-पा की तरह रही थी नमूद अपने वजूद की सो कशिश ने दामन-ए-नाज़ की, उसे भी ज़मीं से मिटा दिया
— शाह नियाज़ अहमद बरेलवी

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