যদি তারে নাই চিনি গো, সে কি আমায় নেবে চিনে? পারব কি গো ডাকতে তারে 'আমার' বলে মনে মনে?

“যদি তারে নাই চিনি গো, সে কি আমায় নেবে চিনে? পারব কি গো ডাকতে তারে 'আমার' বলে মনে মনে?”

— रवींद्रनाथ टैगोर
अर्थ

यदि मैं उन्हें नहीं पहचानता, तो क्या वे मुझे पहचानेंगे? क्या मैं मन ही मन उन्हें 'मेरा' कहकर बुला पाऊँगा?

विस्तार

यह सुंदर दोहा एक गहरे संबंध के बारे में सोचता है, चाहे वह किसी व्यक्ति के साथ हो, किसी आध्यात्मिक गुरु के साथ, या स्वयं ईश्वर के साथ। वक्ता सोचता है, 'यदि मैंने उन्हें सचमुच पहचाना ही नहीं है, तो मैं उनसे मुझे पहचानने की उम्मीद कैसे कर सकता हूँ?' यह आपसी समझ और परस्पर जागरूकता के बारे में एक मार्मिक प्रश्न है। दूसरी पंक्ति और भी गहराई में जाती है, पूछती है, 'यदि मैंने उन्हें पूरी तरह से समझा ही नहीं है कि वे कौन हैं, तो क्या मैं अपने मन में उन्हें 'अपना' कहने लायक महसूस कर पाऊँगा?' यह एक गहरे बंधन की लालसा की बात करता है, यह सवाल करता है कि क्या कोई दूसरे को पूरी तरह से जाने और स्वीकार किए बिना स्वामित्व या अंतरंगता का दावा कर सकता है। यह संबंध और आत्म-खोज की यात्रा पर एक विनम्र प्रतिबिंब है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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