गुलगश्त-ए-चमन करते हो जब हमराह-ए-यारान — नज़ीर अकबराबादी

गुलगश्त-ए-चमन करते हो जब हमराह-ए-यारान वाँ भी ग़रज़ आती हो तुम्हें ख़ार हमें से

“When you stroll through the garden in the company of friends, even there, if need be, you reckon me a thorn in your path.”

— नज़ीर अकबराबादी

अर्थ

जब तुम अपने दोस्तों के साथ बाग़ में सैर करते हो, तो वहाँ भी ज़रूरत पड़ने पर तुम मुझे अपने रास्ते का काँटा समझ लेते हो।

विस्तार

शायर अपने महबूब से थोड़ी शिकायत भरे अंदाज़ में कहता है। जब तुम अपने दोस्तों के साथ बाग़ में सैर करते हो और उसकी ख़ूबसूरती का मज़ा लेते हो, तब भी तुम्हें मेरी ज़रूरत पड़ती है। मगर यह ज़रूरत अजीब है। उस फूलों भरे बाग़ में भी तुम मुझे सिर्फ़ काँटे की तरह याद करते हो। जब किसी को चुभाना या तकलीफ़ देना हो, तभी मेरा ख़याल आता है। यानी ख़ुशी के पलों में भी मैं याद तो आता हूँ, पर हमेशा काँटे के रूप में, कभी फूल बनकर नहीं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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