“With solace, I must keep my patience, Chātaka, gazing at you,Your wish ripened, mine did not, my fiery anguish only grew.”
हे चातक, तुम्हें देखकर मुझे सांत्वना और धैर्य रखना होगा। तुम्हारी इच्छा पूरी हुई, पर मेरी नहीं, और मेरी अग्नि जैसी पीड़ा बस बढ़ती ही गई।
यह दोहा हृदय की गहरी चाहत और हमारी आशाओं व हकीकत के बीच के अंतर को दर्शाता है। कवि चातक पक्षी को देखता है, जो अपनी बारिश के लिए धैर्यपूर्वक इंतजार करने के लिए जाना जाता है। चातक की अटूट आशा और शायद उसकी अंततः पूरी होने वाली इच्छा को देखकर कवि को क्षणिक सांत्वना मिलती है और धैर्य का पाठ भी मिलता है। लेकिन, यह सांत्वना क्षणभंगुर है। कवि विलाप करते हैं कि जहाँ चातक की इच्छाएँ पूरी हुई हैं – 'तुम्हारा तो फलित हुआ' – वहीं उनकी अपनी इच्छाएँ अधूरी हैं। यह अहसास पीड़ा को कम नहीं करता, बल्कि उसे और बढ़ा देता है, जिससे कवि का मन और भारी हो जाता है, यह स्वीकार करते हुए कि उनकी अपनी 'जलन और पीड़ा ही बढ़ गई'।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
