ખરે એ મ્હોરાંનો, મગરૂબ રહે દેશ નવ કાં? મનાએ સત્સંગે, પવિતર કબીરાભગતમાં,

“Indeed, with such countenances, why should the nation not remain proud? It is believed in holy company, in the pure devotion of Kabir.”

— नर्मद
अर्थ

वास्तव में, ऐसे मुखों के साथ, देश क्यों न गर्व करे? यह सत्संग में, कबीर के पवित्र भक्तों में माना जाता है।

विस्तार

यह दोहा बताता है कि एक राष्ट्र को अपने लोगों पर गर्व क्यों नहीं होना चाहिए? इसका कारण यह है कि जब व्यक्ति सत्संग यानी सत्य की संगति या आध्यात्मिक चर्चा में शामिल होते हैं, और कबीर जैसे महान संतों द्वारा दिखाए गए शुद्ध भक्ति मार्ग का पालन करते हैं, तो वे पवित्र हो जाते हैं। नागरिकों का यह आध्यात्मिक परिष्कार किसी भी देश के लिए सम्मान और गौरव का सच्चा स्रोत है। यह दर्शाता है कि आंतरिक पवित्रता और आध्यात्मिक जीवन राष्ट्रीय गौरव और कल्याण के लिए मूलभूत हैं।

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