दम-ए-हिसाब रहा रोज़-ए-हश्र यही है ज़िक्र — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“Even at the hour of reckoning, on Judgment Day, this was the talk: Where, oh where, was the story of our love not told?”
अर्थ
हिसाब के समय, क़यामत के दिन भी यही चर्चा था कि हमारे इश्क़ की कहानी कहाँ-कहाँ न सुनाई गई।
विस्तार
सोचिए उस क़यामत के दिन को, जब हर इंसान के हर काम का हिसाब होता है। मगर शायर कहते हैं कि वहाँ भी बात गुनाहों या नेकियों की नहीं, बल्कि इश्क़ की ही हो रही थी। उनका प्यार इतना मशहूर हो गया था, इतनी चर्चा में रहा, कि वह उस आख़िरी दिन तक उनके साथ चला आया। वे हल्की मुस्कान के साथ पूछते हैं कि मेरे इश्क़ की चर्चा आख़िर कहाँ नहीं हुई? वह दुनिया के हर कोने में फैल गई, और अब तो क़यामत के दिन भी लोग उसी की बात कर रहे हैं। इन शब्दों में गर्व भी है और कोमलता भी। उनके लिए इश्क़ कोई छोटी-सी बात नहीं, बल्कि इतना बड़ा है कि सबसे बड़े दिन भी याद रखा जाए।
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