उमीद-ए-वादा-ए-दीदार-ए-हश्र पर मोमिन — मोमिन ख़ाँ मोमिन

उमीद-ए-वादा-ए-दीदार-ए-हश्र पर मोमिन तू बे-मरा था कि हसरत-कश-ए-बुताँ न हुआ

“On the hope of the promised vision at Judgment Day, O Momin, You died in vain—for you never pined with longing for the idols.”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

ऐ मोमिन, क़यामत के दिन दीदार के वादे की उम्मीद पर तू बेकार मर गया, क्योंकि तूने कभी बुतों (माशूक़ों) की हसरत और चाहत नहीं पाली।

विस्तार

मोमिन खुद से नरमी और हल्के तंज़ के साथ कहते हैं कि वे बस एक उम्मीद के सहारे जीते रहे। वह उम्मीद थी क़यामत के दिन महबूब से मिलने के वादे की। वही दूर का, अनजाना वादा उनकी साँसों को थामे रहा। शायर कहते हैं कि उन्होंने दुनिया की दूसरी ख़ूबसूरतियों की खुलकर हसरत नहीं की, क्योंकि उनका पूरा दिल उसी दूर की पाक मुलाक़ात पर टिका था। इसमें कोमलता भी है और उदासी भी। एक दूर की उम्मीद ही उनके जीने की वजह बन गई, और बाक़ी हर ख़्वाहिश उन्होंने चुपचाप रोक ली। यह एक ऐसे आशिक़ की तस्वीर है जो सब्र और यक़ीन के सहारे जीता है, उस पल का इंतज़ार करते हुए जो शायद आख़िर में ही आए।

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