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तू भी तक़रीब-ए-फ़ातिहा से चल
ब-ख़ुदा वाजिबु्ज़्ज़ियारत है

Even if you approach from the beginning (like Surah Al-Fatiha), the visit to God is obligatory.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

हे तू भी तक़रीब-ए-फ़ातिहा से चल, ब-खुदा वाजिब-उज़्ज़ियारत है। (अर्थ: भले ही तुम शुरुआत (जैसे फ़ातिहा) से करो, खुदा के यहाँ जाना अनिवार्य है।)

विस्तार

यह शेर रिश्तों में निभाए गए फर्ज़ और सच्चे एहसास के बीच के फ़र्क़ को बयां करता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि कई बार, हमारी मुलाक़ातें और हमारा साथ किसी गहरे प्यार की वजह से नहीं होता, बल्कि किसी मजबूरी या दायित्व के एहसास से होता है। शायर हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हमारा रिश्ता सिर्फ़ एक रस्म है, या उसमें दिल की धड़कन भी है।

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