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क़ासिद जो वाँ से आया तो शर्मिंदा मैं हुआ
बेचारा गिर्या-नाक गरेबाँ दरीदा था

When Qasid came from that direction, I felt ashamed; Poor Girya-nak, the beggar, was desolate.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

जब क़ासिद उस दिशा से आया तो मैं शर्मिंदा हुआ; बेचारा गिर्या-नाक, दरिदा था।

विस्तार

यह शेर अचानक से खुलने वाली नज़ाकत और दर्द को बयान करता है। शायर को क़ासिद के आने पर शर्मिंदगी महसूस होती है, मानो उनका अंदरूनी दर्द, उनकी उदासी, और आंसू भरी हालत किसी के सामने उजागर हो गई हो। यह बताता है कि कभी-कभी हमारी सबसे बड़ी खामोशी भी, किसी की एक झलक से टूट जाती है। एक बहुत ही गहरा एहसास है यह!

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