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रुक के जी एक जहाँ दूसरे आलम को गया
तन-ए-तन्हा न तिरे ग़म में हुआ मैं ही हूँ

Stopping to see another world, I went, In your sorrow, my lonely body, I remain.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

रुककर जी एक जहाँ दूसरे आलम को चला गया, पर तुम्हारे ग़म में मेरा अकेला शरीर ही बचा है।

विस्तार

यह शेर दिल की उस उलझन को बयां करता है जब इंसान अपने दर्द में खो जाता है। शायर अपने दिल से कह रहे हैं कि रुक जाओ, क्योंकि हमारा अस्तित्व तो कहीं और चला गया है। लेकिन वो यह भी कह रहे हैं कि चाहे ग़म कितना भी बड़ा क्यों न हो, मेरा 'मैं' तो मैं ही हूँ! यह आत्म-अस्तित्व की एक बहुत ही गहरी बात है।

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