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दर्द-ओ-अंदोह में ठहरा जो रहा मैं ही हूँ
रंग-रू जिस के कभू मुँह न चढ़ा मैं ही हूँ

In sorrow and despair, I am the one who remained, And on whom whose face never showed, I am the one who sustained.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

दर्द और उदासी में जो रुका रहा, मैं ही हूँ; और जिस के रंग-रूप पर कभी मुख नहीं चढ़ा, मैं ही हूँ।

विस्तार

ये शेर एक बहुत गहरा अहसास बयान करता है। शायर कह रहे हैं कि मैं ही वो इंसान हूँ जो दर्द और ग़म में ज़िंदा रहा.... और मैं ही वो हूँ जिसकी खूबसूरती या असलियत कभी पूरी तरह सामने नहीं आई। यह उन लोगों की दास्तान है, जिनकी पीड़ा बहुत गहरी होती है, लेकिन दुनिया उन्हें कभी पूरी तरह समझ नहीं पाती। एक बहुत ही दर्द भरा, लेकिन सच्चा बयान है खुद की पहचान का।

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