जी ही हटे न मेरा तो उस को क्या करूँ मैं
हर-चंद बैठता हूँ मज्लिस में उस से हट हट
“If I do not leave my being, what can I do to that one? I sit in the gathering, moving away from him.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
अगर मैं अपना अस्तित्व नहीं छोड़ता, तो मैं उस व्यक्ति को क्या कर सकता हूँ? मैं महफ़िल में बैठकर उससे दूर होता हूँ।
विस्तार
यह शेर इश्क़ के उस अजीब से जाल को बयान करता है, जहाँ दूरी भी आपको पास ही रखती है। शायर कह रहे हैं कि भले ही मैं शारीरिक रूप से दूर बैठ जाऊँ, पर उस एहसास को क्या करूँगा? यह एक ऐसी मजबूरी है, एक ऐसी चाहत है जो हर जगह, हर पल आपको घेर लेती है। यह महफ़िल में बैठे होने का दर्द है, जहाँ नज़दीक होना भी एक सज़ा है।
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