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दासि 'मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥

Meera, servant of Lord Giridhar, wherever there is sorrow, there is pain.

मीराबाई
अर्थ

मीरा, भगवान गिरिधर की दासी, कहती हैं कि जहाँ दुःख होता है, वहाँ पीड़ा भी अवश्य होती है।

विस्तार

यह दोहा पूजनीय संत-कवि मीराबाई की गहन भक्ति को दर्शाता है। इसमें वे स्वयं को भगवान गिरिधर, जो कृष्ण का ही एक नाम है, की विनम्र दासी बताती हैं। दोहे का दूसरा भाग, "दुःख जहाँ है, वहीं पीड़ा है", जीवन की चुनौतियों पर एक गहरा अवलोकन है। मीराबाई संसार में दुःख और उसके साथ आने वाली पीड़ा की सार्वभौमिक उपस्थिति को स्वीकार करती हैं। हालांकि, अपनी अटूट भक्ति के माध्यम से, वे इन सांसारिक दुखों से ऊपर उठने का मार्ग पाती हैं, अपनी शांति को अपने प्रिय भगवान कृष्ण में स्थापित करती हैं। यह जीवन की अनिवार्य कठिनाइयों के बीच आस्था में सांत्वना और शक्ति खोजने का एक प्रमाण है।

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