“What can I tell you, preacher, of where I now belong? Struck by calamity, my friend, I am neither here nor there.”
हे ज़ाहिद, मैं तुमसे क्या कहूँ कि अब मैं कहाँ का हूँ; विपत्ति का मारा हुआ मैं अब न यहाँ का रहा और न वहाँ का।
शायर यहाँ उपदेशक (ज़ाहिद) से बड़े अपनेपन और बेबसी के साथ कह रहा है कि इश्क की मुसीबत ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। वह न तो धर्म और परहेज़गारी की राह पर टिक सका और न ही दुनिया या महबूब का मुकम्मल साथ पा सका। यह शेर उस इंसान की लाचारी बयां करता है जो दोराहे पर फंसा है—जहाँ से न आगे का रास्ता सूझता है, न पीछे लौटने की गुंजाइश बची है।
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