“The service is done for the sake of the result, not from the heart's desire for action. Kabir says, 'A servant is not valued; what is desired is a multiple of payment.'”
फल के कारण सेवा करना, हृदय की इच्छा से नहीं होता। शायर कहते हैं कि सेवक का मूल्य नहीं है; जो चाहिए वह कई गुना दाम है।
कबीर दास जी यहाँ समझा रहे हैं कि असली सेवा वो नहीं जो किसी फल या इनाम की उम्मीद में की जाए। वे कहते हैं कि अगर हमारा मन काम में नहीं है और हम सिर्फ़ चौगुने दाम या ज़्यादा फ़ायदे के लिए कोई काम कर रहे हैं, तो वो सच्ची सेवा नहीं है। यह तो एक तरह का लेन-देन हो गया, जबकि सच्ची निष्ठा और सेवा हमेशा निस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। कबीर जी हमें सिखाते हैं कि किसी भी काम में हमारे दिल की ईमानदारी बहुत मायने रखती है, न कि सिर्फ़ उसका नतीजा या मिलने वाला लाभ।
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