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जहाँ काम तहाँ नाम नहिं , जहाँ नाम नहिं वहाँ काम। दोनों कबहूँ नहिं मिले , रवि रजनी इक धाम॥ 84॥

Where there is desire, there is no name; where there is no name, there is desire. These two never meet, sun and night, in one place.

कबीर
अर्थ

जहाँ इच्छा होती है, वहाँ नाम नहीं होता; और जहाँ नाम नहीं होता, वहाँ इच्छा होती है। ये दोनों चीजें कभी नहीं मिलतीं—जैसे सूर्य और रात कभी एक ही स्थान पर नहीं होते।

विस्तार

कबीरदास जी इस दोहे में कितनी सीधी बात कहते हैं कि जहाँ हमारी worldly इच्छाएँ और लालच (काम) होते हैं, वहाँ प्रभु का नाम या उनकी याद (नाम) ठहर नहीं पाती। ठीक वैसे ही, जहाँ प्रभु की याद होती है, वहाँ ये इच्छाएँ अपना असर नहीं दिखा पातीं। यह कुछ ऐसा है जैसे सूरज और रात कभी एक जगह पर, एक ही समय में नहीं मिल सकते; हमें इनमें से किसी एक को चुनना पड़ता है।

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