दाया भाव ह्र्दय नहीं , ज्ञान थके बेहद। ते नर नरक ही जायेंगे , सुनि-सुनि साखी शब्द॥

“A heart devoid of compassion, a mind weary of knowledge, Such men shall surely go to hell, these are the words I proclaim.”

— कबीर
अर्थ

दया भाव हृदय नहीं, ज्ञान थके बेहद। ते नर नरक ही जायेंगे, सुनि-सुनि साखी शब्द॥ इसका शाब्दिक अर्थ है कि जिस मनुष्य का हृदय दया से रहित है और जिसका मन ज्ञान के बोझ से थका हुआ है, वह निश्चित रूप से नर्क में जाएगा। ये शब्द साखी के रूप में कहे गए हैं।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में समझाते हैं कि केवल ज्ञान इकट्ठा कर लेने से कुछ नहीं होता, अगर हमारा हृदय दया और करुणा से खाली हो। ऐसा ज्ञान जो हमें दूसरों के प्रति संवेदनशीलता न सिखाए, वह व्यर्थ है और एक बोझ बन जाता है। सच्चा ज्ञान तो वही है जो हमारे मन में प्रेम और सहानुभूति जगाए, क्योंकि बिना करुणा के, मनुष्य सद्गति नहीं पा सकता।

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