कबीरा जपना काठ की , क्या दिख्लावे मोय। ह्रदय नाम न जपेगा , यह जपनी क्या होय॥ 43॥
“Kabira, chanting the name of Kaath, what will you show me? This heart will not chant the name; what is this recitation?”
— कबीर
अर्थ
कबीरा, काठ की माला से मुझे क्या दिखाई देगा? मेरा हृदय नाम नहीं जपेगा; यह जपनी क्या चीज़ है।
विस्तार
कबीरदास जी यहाँ समझा रहे हैं कि हाथ में लकड़ी की माला लेकर बस बाहरी तौर पर नाम जपने का कोई फायदा नहीं, अगर मन उसमें लीन न हो। वे कहते हैं कि अगर दिल ही ईश्वर का नाम सच्चे भाव से नहीं जपेगा, तो भला ये दिखावटी माला जपना किस काम का? असल भक्ति तो भीतर से उपजती है, मन की सच्ची लगन से, न कि बस ऊपरी तौर पर नियमों का पालन करने से।
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