मैं रोऊँ जब जगत को , मोको रोवे न होय। मोको रोबे सोचना , जो शब्द बोय की होय॥ 38॥
“When I weep for the world, may it not weep for me. May the words that speak of me's sorrow, not be spoken.”
— कबीर
अर्थ
जब मैं संसार के लिए रोऊँ, तो संसार को मेरे लिए नहीं रोना चाहिए। वे शब्द जो मेरे दुख की बात करें, वे नहीं बोले जाने चाहिए।
विस्तार
कबीरदास जी इस दोहे में कितनी प्यारी बात कह रहे हैं कि मैं दुनिया के दुख पर तो रोऊँ, पर मेरी अपनी पीड़ा पर कोई न रोए। वे चाहते हैं कि उनकी संवेदनाएँ दूसरों के लिए हों, लेकिन उनका खुद का दुख उनके भीतर ही समाया रहे, कोई शब्द उसे बाहर न ला पाए। यह एक ऐसी गहरी आध्यात्मिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए महसूस करता है, पर अपनी पहचान और अपनी आंतरिक शांति को बाहरी दुनिया के जजमेंट या दया से परे रखता है।
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