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पाँच पहर धन्धे गया , तीन पहर गया सोय। एक पहर हरि नाम बिन , मुक्ति कैसे होय॥

Five watch-periods passed, three watch-periods went by; without the name of Hari for one watch-period, how can liberation be attained?

कबीर
अर्थ

पाँच पहर दिन गए, तीन पहर सो गए। एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में बड़े प्रेम से समझा रहे हैं कि हम अपना पूरा दिन कैसे बिताते हैं। वो कहते हैं कि पाँच पहर तो हम काम-धंधे में लगा देते हैं और तीन पहर सोने में निकल जाते हैं। अगर इतने बड़े समय में से एक छोटा-सा 'पहर' भी हम भगवान हरि का नाम लेने में नहीं लगाते, तो फिर भला मुक्ति की आशा कैसे कर सकते हैं? यह हमें याद दिलाता है कि जीवन की भागदौड़ में भी, ईश्वर स्मरण के लिए थोड़ा समय निकालना कितना ज़रूरी है।

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