“When devotion is for worldly gain, it is fruitless service. Kabir says, why ask for it, abandon devotion (to the gods).”
जब तक भक्ति सकाम है, तब तक सेवा निष्फल है। कबीर कहते हैं, वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव।
यह दोहा हमें बताता है कि जब हमारी भक्ति किसी फल की इच्छा से बंधी होती है, तो वह केवल एक खोखली सेवा है, जिससे कुछ हासिल नहीं होता। कबीर साहब कितनी प्यारी बात कहते हैं कि सच्चे ईश्वर से मिलन भला कैसे हो सकता है, जब हम अपनी भक्ति को ही कामनाओं का बोझ ढो रहे हों? वो हमें सिखाते हैं कि जैसे एक नदी बिना किसी उम्मीद के बहती है, वैसे ही हमें भी निष्काम भाव से जुड़ना चाहिए और सारी अपेक्षाओं को छोड़ देना चाहिए। तभी हम सच्चे अर्थों में उस विराट सत्ता से जुड़ पाते हैं।
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