“To the Guru, you should offer worship countless times. The insect does not know the bee, just as the leaf is like the hand of the master.”
गुरु के लिए कोटि-कोटि प्रणाम अर्पित करें। कीड़ा भौंरे को नहीं जानता, वैसे ही गुरु का हाथ स्वयं के समान होता है।
कबीर दास जी यहाँ गुरु के प्रति असीम श्रद्धा और समर्पण का भाव समझाते हैं। वे कहते हैं कि शिष्य, एक छोटे कीट की तरह, गुरु की महानता और ज्ञान को शायद तुरंत न समझ पाए, जैसे एक सामान्य कीट भौंरे की महिमा को नहीं जानता। लेकिन, गुरु अपने ज्ञान और कृपा से उस शिष्य को भी अपने समान ऊँचा उठा देते हैं, उसकी अज्ञानता को दूर कर देते हैं। यह दर्शाता है कि गुरु की कृपा से ही शिष्य का वास्तविक आध्यात्मिक विकास संभव है।
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