राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस। रहे कबीर पाखण्ड सब , झूठे सदा निराश॥ — कबीर
“Ram remains within the forest, the worship of the Guru has no desire. Kabir remains, all hypocrisy, always false and disappointed.”
अर्थ
राम जंगल में ही निवास करते हैं, गुरु की पूजा में कोई आस नहीं है। कबीर सब पाखंड हैं, झूठे और सदा निराश हैं।
विस्तार
यह दोहा हमें समझाता है कि असली राम या परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही निवास करते हैं, जैसे जंगल के एकांत में। जब सत्य हमारे अंदर है, तो गुरु की बाहरी पूजा या किसी भी आडंबर की कोई ज़रूरत नहीं रह जाती। कबीर दास जी कहते हैं कि यह सारा बाहरी दिखावा और पाखण्ड हमेशा झूठा साबित होता है, जो अंततः केवल निराशा ही देता है।
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