“Leaving the life's pursuits, one should dedicate oneself to Hari (God). If the head is offered to Hari, then truly there is no loss. O, my enemies, as many as the stars in the sky, even if the body is broken and the head hangs like a vulture, you will never forget me.”
सिर साटें हरि सेवेये, छांड़ि जीव की बाणि। जे सिर दीया हरि मिलै, तब लगि हाणि न जाणि॥ और जेते तारे रैणि के, तेतै बैरी मुझ। धड़ सूली सिर कंगुरै, तऊ न बिसारौ तुझ॥
कबीर कहते हैं कि सच्चे सुख के लिए हमें दुनियावी मोह छोड़कर अपना जीवन पूरी तरह से हरि (ईश्वर) को समर्पित कर देना चाहिए। वे समझाते हैं कि अगर हम अपना अहंकार या 'सिर' भगवान को अर्पित कर दें, तो इसमें कोई वास्तविक नुकसान नहीं, बल्कि सच्ची प्राप्ति है। अपने अटूट प्रेम और विश्वास को दर्शाते हुए वे कहते हैं कि चाहे कितने भी दुश्मन हों और वे उन्हें मिटाने की कितनी भी कोशिश करें, फिर भी कबीर को हमेशा याद रखा जाएगा।
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