“A saint is like sandalwood, but the world is like a snake. Though it wraps its coils around, there is no defilement in the heart.”
चंदन के समान साधु है, पर संसार सर्प के समान है। यह अपने वाक से लिपटा रहे, पर मन में कोई विकार नहीं होता।
कबीरदास जी इस दोहे में बताते हैं कि एक सच्चा साधु चंदन के पेड़ जैसा पवित्र और शीतल होता है, और यह संसार एक साँप की तरह है। जैसे साँप चंदन से लिपटा रहता है पर चंदन अपनी शीतलता और सुगंध नहीं छोड़ता, वैसे ही संसार की बुराइयाँ और मोह-माया साधु को घेर लेती हैं। पर इसके बावजूद साधु का मन निर्मल रहता है और उस पर कोई विकार हावी नहीं हो पाता। यह दोहा हमें सिखाता है कि सच्ची पवित्रता भीतर से आती है, जिसे बाहरी दुनिया की कोई भी चुनौती छू नहीं सकती।
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