माला फेरत जुग भया , फिरा न मन का फेर। कर का मन का डार दें , मन का मनका फेर॥

“Though ages pass in stringing beads, the mind's inclination hasn't changed. Let us discard the heart's attachments, and change the beads of the mind.”

— कबीर
अर्थ

माला फेरने में युग बीत गए, लेकिन मन की प्रवृत्ति नहीं बदली। मन के मोह और लगाव को त्यागकर, मन के मनकों को बदलना चाहिए।

विस्तार

कबीर दास जी हमें समझाते हैं कि केवल हाथ में माला फेरते-फेरते चाहे युग बीत जाएँ, लेकिन मन की वृत्तियाँ नहीं बदलतीं। वे कहते हैं कि बाहरी दिखावे की इन मोतियों को छोड़ो और असली काम तो अपने मन के भीतर के विचारों और भावों को बदलने का है। जब हम अंदर से खुद को बदलते हैं, अपने मन के 'मनकों' को सही दिशा देते हैं, तभी सच्ची शांति और परिवर्तन आता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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