“For your sake, O Hari, my Lord! I shall not disgrace your sword.”
हे हरि, मेरे नाथ! मैं तुम्हारी तलवार को लज्जित नहीं करूँगा।
यह दोहा निष्ठा और भक्ति की एक सशक्त घोषणा है। इसमें भक्त अपने प्रिय भगवान हरि से कह रहा है, 'हे नाथ, आपकी खातिर, मैं कभी आपकी तलवार को लज्जित नहीं होने दूँगा।' यहाँ 'तलवार' केवल एक हथियार नहीं, बल्कि भगवान के सम्मान, उनकी शक्ति और उनकी प्रतिष्ठा का प्रतीक है। भक्त यह प्रण ले रहा है कि वह हर कार्य साहस, ईमानदारी और पूर्ण समर्पण से करेगा, ताकि भगवान की गरिमा हमेशा बनी रहे। वह वचन देता है कि ऐसा कोई भी काम नहीं करेगा जिससे उसके आराध्य को अपमान या शर्मिंदगी उठानी पड़े। यह अपने प्रभु के उच्च आदर्शों पर चलने और अपने कर्मों से उनकी महिमा को अक्षुण्ण रखने की गहरी प्रतिज्ञा है।
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