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પૉર ને બપોર એની બળબળતી દેહના કરતી'તી રોજ રોજ છૂંદા;

From morn till noon, her body, burning bright,Each day it formed its own bruised plight.

ज़वेરचंद मेघानी
अर्थ

सुबह से दोपहर तक, उसके जलते हुए शरीर पर रोज़-रोज़ घाव बनते थे।

विस्तार

यह दोहा निरंतर पीड़ा का मार्मिक चित्रण करता है। यह उस शरीर की बात करता है जो आंतरिक दर्द या यातना से 'जल रहा है', और सुबह से दोपहर तक, हर रोज़ लगातार कठिनाइयों को झेल रहा है। यहाँ वर्णित 'छूंदे' केवल शारीरिक चोटें नहीं हैं, बल्कि इस पीड़ा द्वारा लगाए गए गहरे, निरंतर घावों का प्रतीक हैं। यह एक ऐसे व्यक्ति की गहरी भावना को व्यक्त करता है जो अपने संघर्षों के निशानों को लगातार ढो रहा है, जिससे दर्द के एक अंतहीन चक्र और उसके अस्तित्व पर पड़ने वाले दृश्य प्रभाव पर प्रकाश डाला गया है। यह चुपचाप सहने वाली पीड़ा का एक हृदयविदारक वर्णन है।

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