“The days when I was alone in the gathering, / Now there are more secrets of mine here.”
वो दिन गए जब मैं महफ़िल में अकेला था, अब यहाँ मेरे और भी राज़-दाँ हैं।
यह शेर बदलते वक़्त और रिश्तों की सच्चाई को बयां करता है। शायर, अल्लामा इकबाल, उस दौर को याद कर रहे हैं जब महफ़िल में उनका तन्हाई का एहसास एक निजी, पावन जगह हुआ करता था। लेकिन अब वो बात नहीं रही। 'राज़-दाँ' अब केवल एक या दो नहीं हैं; वो बहुत से हैं। यह एक दिल को छू लेने वाली बात है कि कैसे सामाजिक दायरे बदलते हैं, और वो सुकून खो देते हैं जो हमें पहले मिलता था।
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