क़बा-ए-इल्म ओ हुनर लुत्फ़-ए-ख़ास है वर्ना — अल्लामा इक़बाल
“The cloak of knowledge and art is a special grace, else in your gaze, my displeasing form was...”
अर्थ
ज्ञान और कला का यह आवरण एक विशेष कृपा है, वरना तेरी निगाह में मेरा नापसंद शरीर था।
विस्तार
इस शेर में शायर एक बहुत गहरा फ़लसफ़ा बयान कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि सिर्फ़ बाहरी सुंदरता या रूप-रंग काफी नहीं होता। शायर के अनुसार, जो चीज़ उन्हें बचाती है, वो है ज्ञान और हुनर की शालीनता। अगर उनके पास ये न होता, तो उनकी सादगी... या उनका रूप ही उन्हें महबूब की निगाह में नापसंद कर देती। यह पंक्तियाँ बताती हैं कि असली क़ीमत हमेशा अंदर होती है।
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