न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ मैं

“Neither were the summers in love, nor were the coquettishness in beauty, Nor were they agonizing in Ghaznavi, nor is it the intoxication of Ayaz's tresses.”

— अल्लामा इक़बाल
अर्थ

न इश्क़ में गर्मियाँ रहीं, न हुस्न में शोख़ियाँ; न ग़ज़नवी में तड़प रही, न ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में।

विस्तार

यह शेर, अल्लामा इकबाल साहब का, एक बहुत गहरा आत्म-विश्वास दिखाता है। शायर कहते हैं कि इश्क़ की गर्मियाँ, हुस्न की शोख़ियाँ, और यहाँ तक कि किसी जगह या यादों का तड़प... ये सब तो समय के साथ गुज़र जाते हैं। लेकिन एक बात है जो कभी खत्म नहीं होती! वह है उनकी अपनी ज़ुल्फ़ों में छिपा वो नशा, वो ख़म... जो उन्हें हमेशा महकते रखता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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