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किसे ख़बर कि सफ़ीने डुबो चुकी कितने
फ़क़ीह ओ सूफ़ी ओ शाइर की ना-ख़ुश-अंदेशी

Who knows how many a ship, by the displeasure of the learned, the mystic, and the poet, has been sunk?

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

किसे पता कि कितने जहाज़ (सफ़ीने) विद्वानों, संतों और कवियों की अप्रसन्नता से डूब चुके हैं।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ शायरी की बात नहीं करता, बल्कि यह ज्ञान और ज़िन्दगी की उलझनों पर एक गहरा तंज़ है। शायर कहते हैं कि इंसान कितना भी ज्ञानी क्यों न हो जाए—चाहे वो फ़क़ीह हो, सूफ़ी हो, या शायर—कभी-कभी ना-समझ या ग़लत सोच के कारण अपनी ही कश्ती डुबो बैठता है। यह एक चेतावनी है कि ज्ञान के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है।

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