काफ़िर है मुनकिर उसकी करीमी की शान का — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

काफ़िर है मुनकिर उसकी करीमी की शान का ख़ाली प्याला कब कफ़-ए-साइल में रह गया

“An infidel is he who denies the splendor of His bounty— when did an empty bowl ever stay in the beggar's palm?”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

जो उसकी उदारता की महानता को नकारता है वह काफ़िर है; भला माँगने वाले के हाथ में खाली प्याला कब रहा?

विस्तार

यह शेर उस परम दाता की असीम उदारता की तारीफ़ करता है। शायर कहते हैं कि जो उसकी देने की शान को नकारे, वह मानो काफ़िर है, सच्चाई से अंजान। सोचिए एक सवाली अपने हाथ फैलाए, मदद की दरख़्वास्त करता हुआ। ऐसे दाता के सामने उसका प्याला कब ख़ाली रहा है? कभी नहीं। उसकी मेहरबानी इतनी बेपनाह है कि जो सच्चे दिल से मांगता है, वह ख़ाली हाथ नहीं लौटता। यह एक नरम याद दिलाना है कि उसकी रहमत हमेशा जवाब देती है, और उस उदारता पर शक करना उसकी असल शान को न पहचानना है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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