ग़ज़ल
ज़-बस-कि मश्क़-ए-तमाशा जुनूँ-अलामत है
ز بسکہ مشق تماشا جنوں علامت ہے
इस ग़ज़ल में ग़ालिब ने देखने की निरंतर लालसा को दीवानगी और पछतावे का कारण बताया है। वे प्रेम में टूटे हुए वादों, आत्म-ग्लानि और अंतर्मन की बेचैनी को अत्यंत गहरे दार्शनिक भावों के साथ प्रस्तुत करते हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ज़-बस-कि मश्क़-ए-तमाशा जुनूँ-अलामत है
कुशाद-ओ-बस्त-ए-मिज़्हा सीली-ए-नदामत है
2
न जानूँ क्यूँकि मिटे दाग़-ए-तान-ए-बद-अहदी
तुझे कि आइना भी वार्ता-ए-मलामत है
3
ब-पेच-ओ-ताब-ए-हवस सिल्क-ए-आफ़ियत मत तोड़
निगाह-ए-अज्ज़ सर-ए-रिश्ता-ए-सलामत है
4
वफ़ा मुक़ाबिल-ओ-दावा-ए-इश्क़ बे-बुनियाद
जुनूँ-ए-साख़्ता ओ फ़स्ल-ए-गुल क़यामत है
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