ग़ज़ल
यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का
یک ذرۂ زمیں نہیں بے کار باغ کا
यह ग़ज़ल कायनात में हर चीज़ के अंतर्संबंध और उद्देश्य पर विचार करती है, यह सुझाती है कि एक राह या दुख का भी अपना एक किरदार होता है। फिर यह बोध की चुनौतीपूर्ण प्रकृति पर प्रकाश डालती है, संकेत देती है कि इसका बोझ पलायन की आवश्यकता पैदा कर सकता है। शेर प्रेम की कथित अतार्किकता और शायर की शायरी के प्रति गहरी, चिरस्थायी निष्ठा को भी उजागर करते हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का
याँ जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का
बाग़ की ज़मीन का एक भी कण बेकार नहीं है, यहाँ तक कि रास्ता भी लाले के दाग़ के लिए एक फ़तीला है।
2
बे-मय किसे है ताक़त-ए-आशोब-ए-आगही
खींचा है इज्ज़-ए-हौसला ने ख़त अयाग़ का
बिना शराब के होश की बेचैनी सहने की शक्ति किसमें है? हिम्मत की कमज़ोरी ने ही प्याले की लकीर खींची है।
3
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
गुलाब बुलबुल के दीवानेपन पर हँसते हैं। वे कहते हैं कि जिसे इश्क़ कहते हैं, वह दिमाग़ का एक दोष है।
4
ताज़ा नहीं है नश्शा-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न मुझे
तिर्याकी-ए-क़दीम हूँ दूद-ए-चराग़ का
मुझे काव्य-चिंतन का नशा नया नहीं है; मैं चिराग़ के धुएँ का पुराना व्यसनी हूँ।
5
सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए
पर क्या करें कि दिल ही अदू है फ़राग़ का
मैं सौ बार प्रेम के बंधनों से मुक्त हुआ, पर क्या करें कि मेरा हृदय ही शांति का शत्रु है।
6
बे-ख़ून-ए-दिल है चश्म में मौज-ए-निगह ग़ुबार
ये मय-कदा ख़राब है मय के सुराग़ का
आँख में निगाह की लहर दिल के रक्त के बिना धूल है। यह मयखाना बर्बाद है क्योंकि यहाँ शराब का कोई निशान नहीं मिलता।
7
बाग़-ए-शगुफ़्ता तेरा बिसात-ए-नशात-ए-दिल
अब्र-ए-बहार ख़ुम-कद किस के दिमाग़ का?
आपका खिला हुआ बाग़ दिल की खुशी का विस्तार है। बसंत के बादल की मादकता के लिए किसका दिमाग़ एक शराबखाना बन गया है?
8
जोश-ए-बहार-ए-कुल्फ़त-ए-नज़्ज़ारा है 'असद'
है अब्र पम्बा रौज़न-ए-दीवार-ए-बाग़ का
हे असद, नज़ारे की कुल्फ़त (तकलीफ) की बहार का ऐसा जोश है कि बाग़ की दीवार के रौज़न (छेद/खिड़की) का बादल रुई बन गया है।
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