ग़ज़ल
वाँ उस को हौल-ए-दिल है तो याँ मैं हूँ शर्म-सार
واں اس کو ہولِ دل ہے تو یاں میں ہوں شرمسار
यह ग़ज़ल भावनाओं के आपसी जुड़ाव को दर्शाती है, जहाँ प्रियतम के मन का डर या बेचैनी शायर की अपनी आह के प्रभाव से हो सकती है। यह आत्मनिरीक्षण पर ज़ोर देती है, यह समझाते हुए कि व्यक्ति को केवल अपने बाहरी रूप को नहीं, बल्कि अपनी भीतर की क्रूरता या सितम करने की इच्छा को देखना चाहिए, ताकि गहरी आत्म-जागरूकता प्राप्त हो सके।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
वाँ उस को हौल-ए-दिल है तो याँ मैं हूँ शर्म-सार
या'नी ये मेरी आह की तासीर से न हो
वहाँ उसके दिल में डर है और यहाँ मैं शर्मिंदा हूँ। कहीं यह मेरी आह के असर से न हो।
2
अपने को देखता नहीं ज़ौक़-ए-सितम को देख
आईना ता-कि दीदा-ए-नख़चीर से न हो
अपने आप को मत देखो, बल्कि क्रूरता के आनंद को देखो, ताकि दर्पण किसी शिकार हुए प्राणी की आँख न बन जाए।
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