ग़ज़ल

रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए

رونے سے اور عشق میں بےباک ہو گئے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: गए

यह ग़ज़ल जीवन के अनुभवों की विरोधाभासी प्रकृति को दर्शाती है, जहाँ इश्क़ में रोना बेबाकी और पाकीज़गी लाता है, और दुनियावी रुस्वाई चालाकी में बदल जाती है। यह बताती है कि बुलबुल के नाले जैसे निस्फल दिखने वाले कार्य भी गहरे, छिपे हुए प्रभाव डाल सकते हैं, जो दुख और समर्पण के माध्यम से स्वयं को रूपांतरित करते हैं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए
आँसुओं के ज़रिए हम इश्क़ में और निडर हो गए। इतने धोए गए कि हम बस पवित्र हो गए।
2
सर्फ़-ए-बहा-ए-मय हुए आलात-ए-मय-कशी थे ये ही दो हिसाब सो यूँ पाक हो गए
शराब पीने के उपकरण शराब की कीमत चुकाने में खर्च हो गए। यही दो हिसाब थे, सो वे इस तरह से साफ हो गए।
3
रुस्वा-ए-दहर गो हुए आवारगी से तुम बारे तबीअतों के तो चालाक हो गए
यद्यपि तुम्हारी आवारागर्दी ने तुम्हें दुनिया में बदनाम कर दिया, फिर भी तुम स्वभावों को समझने में चतुर हो गए।
4
कहता है कौन नाला-ए-बुलबुल को बे-असर पर्दे में गुल के लाख जिगर चाक हो गए
कौन कहता है कि बुलबुल का रुदन बेअसर है? फूल के परदे में लाखों दिल घायल हो गए हैं।
5
पूछे है क्या वजूद ओ अदम अहल-ए-शौक़ का आप अपनी आग के ख़स-ओ-ख़ाशाक हो गए
अहल-ए-शौक़ (उत्साही लोगों) के लिए अस्तित्व और अनस्तित्व क्या मायने रखते हैं? वे अपनी ही आग के लिए स्वयं घास-फूस और ईंधन बन गए हैं।
6
करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला की एक ही निगाह कि बस ख़ाक हो गए
हम उससे उसकी उपेक्षा की शिकायत करने गए थे, लेकिन उसकी एक ही नज़र से हम बस राख हो गए।
7
इस रंग से उठाई कल उस ने 'असद' की ना'श दुश्मन भी जिस को देख के ग़मनाक हो गए
कल 'असद' का जनाज़ा इस तरह उठाया गया कि दुश्मन भी उसे देखकर ग़मगीन हो गए।
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