रहा गर कोई ता-क़यामत सलामत फिर इक रोज़ मरना है हज़रत-सलामत

“Even if one stays safe and sound until the Day of Doom, / Still, one day, my good sir, one must surrender to the tomb.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

अगर कोई क़यामत के दिन तक भी सही-सलामत ज़िंदा रह जाए, तब भी ऐ मोहतरम, आख़िरकार एक दिन तो मरना ही है।

विस्तार

शायर यहाँ एक मीठे व्यंग्य के साथ ज़िंदगी की सबसे अटल सच्चाई बयान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर कोई इंसान तमाम ख़तरों से बचकर क़यामत के दिन तक भी सही-सलामत जी ले, तब भी आख़िरकार उसे एक दिन मौत का ज़ायक़ा चखना ही पड़ेगा। 'हज़रत-सलामत' कहकर शायर ने इंसान के उस वहम और घमंड पर हल्की-सी चोट की है जो ख़ुद को अमर समझता है, और हमें जीवन की नश्वरता व विनम्रता की याद दिलाई है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

1 / 10Next →