नहीं गर हमदमी आसाँ न हो ये रश्क क्या कम है
न दी होती ख़ुदाया आरज़ू-ए-दोस्त दुश्मन को
“If companionship isn't easy, is this torment any less? O God, if only you hadn't given the foe the longing for a friend.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
यदि साथ रहना आसान न हो, तो क्या यह ईर्ष्या या पीड़ा कम है? हे ईश्वर, काश तुमने दुश्मन को भी दोस्त की चाहत न दी होती।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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