ग़ज़ल
पीनस में गुज़रते हैं जो कूचे से वो मेरे
پینس میں گزرتے ہیں جو کوچے سے وہ میرے
यह ग़ज़ल महबूब की बेरुख़ी, नाज़-ओ-अंदाज़ और आशिक़ की गली से बिना रुके तेज़ी से गुज़र जाने की तड़प को दर्शाती है। इसमें प्रेमी के प्रति माशूक़ की निष्ठुर उपेक्षा और विरह की मीठी वेदना को अत्यंत ख़ूबसूरती से व्यक्त किया गया है।
Source: rekhta · HI
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पीनस में गुज़रते हैं जो कूचे से वो मेरे
कंधा भी कहारों को बदलने नहीं देते
जब वे पालकी में सवार होकर मेरी गली से गुज़रते हैं, तो पालकी उठाने वाले कहारों को कंधा तक बदलने नहीं देते ताकि ज़रा भी देर न रुकना पड़े।
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