ग़ज़ल

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया

پھر مجھے دیدہ تر یاد آیا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: आया

यह ग़ज़ल प्रियतम से बिछड़ने के तीव्र दर्द और पीड़ा को व्यक्त करती है। शायर को अपनी नम आँखों और प्रिय के जाने से उत्पन्न हुए उस प्रलयकारी दुख की याद बार-बार आती है, मानो उनके जाने से ही क़यामत आ गई हो। इसमें विरह और रुदन की गहरी भावना समाहित है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया दिल जिगर तिश्ना-ए-फ़रयाद आया
फिर मुझे नम आँखों की याद आई। मेरा दिल और जिगर फ़रियाद के लिए प्यासा हो उठा।
2
दम लिया था न क़यामत ने हनूज़ फिर तिरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया
क़यामत ने अभी साँस भी नहीं ली थी कि मुझे तुम्हारे जाने का समय याद आ गया।
3
सादगी-हा-ए-तमन्ना या'नी फिर वो नैरंग-ए-नज़र याद आया
मेरी इच्छाओं की सादगी का ज़िक्र करते हुए, मुझे फिर से उस दिलकश निगाह का जादू याद आ गया।
4
उज़्र-ए-वामांदगी ऐ हसरत-ए-दिल नाला करता था जिगर याद आया
ऐ दिल की आरज़ू, मेरी वामांदगी का बहाना यह था कि मैं रो रहा था। फिर मुझे मेरा जिगर याद आया।
5
ज़िंदगी यूँ भी गुज़र ही जाती क्यूँ तिरा राहगुज़र याद आया
जीवन तो वैसे भी कट ही जाता, फिर तुम्हारा रास्ता क्यों याद आया?
6
क्या ही रिज़वाँ से लड़ाई होगी घर तिरा ख़ुल्द में गर याद आया
यदि मुझे स्वर्ग में तुम्हारा घर याद आया, तो रिज़वाँ (स्वर्ग के द्वारपाल) से कितनी बड़ी लड़ाई होगी।
7
आह वो जुरअत-ए-फ़रियाद कहाँ दिल से तंग आ के जिगर याद आया
आह, अब वह शिकायत करने की हिम्मत कहाँ है? दिल से परेशान होकर मुझे अपना साहस याद आया।
8
फिर तिरे कूचे को जाता है ख़याल दिल-ए-गुम-गश्ता मगर याद आया
मेरा ख़याल फिर तुम्हारे कूचे की ओर जाता है। क्या भूले हुए दिल को मगर याद आया?
9
कोई वीरानी सी वीरानी है दश्त को देख के घर याद आया
यह एक बहुत ही गहरी और अजीब-सी उदासी है। इस रेगिस्तान को देखकर मुझे अपना घर याद आ गया।
10
मैं ने मजनूँ पे लड़कपन में 'असद' संग उठाया था कि सर याद आया
असद, मैंने बचपन में मजनूँ पर पत्थर उठाया था, लेकिन फिर मुझे अपना ही सर याद आ गया।
11
वस्ल में हिज्र का डर याद आया ऐन जन्नत में सक़र याद आया
मिलन के समय बिछड़ने का डर याद आया। ठीक जन्नत में भी जहन्नुम का डर याद आया।
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