बाइस-ए-वामांदगी है उम्र-ए-फ़ुर्सत-जू मुझे — मिर्ज़ा ग़ालिब
“A life forever seeking respite has worn me down completely; it has fettered my feet to the elusive flight of a deer.”
अर्थ
फ़ुर्सत की तलाश में रहने वाली मेरी ज़िंदगी ही मेरी थकान का कारण बन गई है, और हिरन की तेज़ भाग-दौड़ ने मेरे पैरों को ज़ंजीर में जकड़ दिया है।
विस्तार
इस शे’र में ग़ालिब एक ख़ूबसूरत विरोधाभास पेश करते हैं कि सुकून की तलाश ही इंसान की सबसे बड़ी थकान बन जाती है। शायर कहते हैं कि फ़ुरसत और चैन की उम्मीद एक चौकड़ी भरते हिरन की तरह है, जिसके पीछे भागते-भागते उनके क़दम ही जकड़ गए हैं। जिस आराम की ख़्वाहिश में वे भागे थे, उसी की अंतहीन दौड़ ने उलटा उनके पैरों में बेबसी की ज़ंजीर बाँध दी है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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