ग़ज़ल
नश्शा-हा शादाब-ए-रंग ओ साज़-हा मस्त-ए-तरब
نَشّہ ہا شادابِ رَنگ و ساز ہا مَستِ طَرَب
यह ग़ज़ल एक जीवंत आनंद और मस्ती के माहौल का सुंदर चित्रण करती है, जहाँ रंग ताज़े हैं और संगीत के साज़ मस्ती में डूबे हुए हैं। यह एक ऐसी महफ़िल का वर्णन करती है जहाँ शराब का एक गिलास भी धुनों की धारा में एक हरे-भरे सरू जैसा प्रतीत होता है। शायर इंगित करता है कि इस माहौल में, उसके दुख भरे विलापों को भी एक नग्मे का सम्मान दिया जाता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
नश्शा-हा शादाब-ए-रंग ओ साज़-हा मस्त-ए-तरब
शीशा-ए-मय सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा है
नशे रंगों से शादाब हैं और साज़ खुशी से मस्त हैं। शराब का शीशा नग़्मों की नदी में एक हरे-भरे सरू के पेड़ जैसा है।
2
हम-नशीं मत कह कि बरहम कर न बज़्म-ए-ऐश-ए-दोस्त
वाँ तो मेरे नाले को भी ए'तिबार-ए-नग़्मा है
ऐ हम-नशीं, यह मत कहो कि प्रिय की आनंद-सभा को भंग न करूँ। क्योंकि उस जगह तो मेरे विलाप को भी संगीत समझा जाता है।
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