ग़ज़ल
नहीं कि मुझ को क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं
نہیں کہ مجھ کو قیامت کا اعتقاد نہیں
यह ग़ज़ल जुदाई के दर्द और महबूब की बेरुखी को बयान करती है। शायर कहता है कि उसे क़यामत पर ए'तिक़ाद है, लेकिन जुदाई की रात क़यामत से कम नहीं। महबूब की बेपरवाही ऐसी है कि न वह आने पर इस्तकबाल करते हैं और न जाने पर अलविदा कहते हैं। यहाँ तक कि शायर की याद को भी महबूब अपनी महफ़िल में फ़ित्ना-ओ-फ़साद की गैरमौजूदगी से जोड़ता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
नहीं कि मुझ को क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं
शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं
यह नहीं कि मुझे क़यामत पर विश्वास नहीं है, बल्कि जुदाई की रात से क़यामत का दिन ज़्यादा लंबा नहीं लगता।
2
कोई कहे कि शब-ए-मह में क्या बुराई है
बला से आज अगर दिन को अब्र ओ बाद नहीं
यदि कोई पूछे कि चाँदनी रात में क्या बुराई है, तो रहने दो; क्या फर्क पड़ता है अगर आज दिन में बादल और हवा नहीं हैं।
3
जो आऊँ सामने उन के तो मर्हबा न कहें
जो जाऊँ वाँ से कहीं को तो ख़ैर-बाद नहीं
यदि मैं उनके सामने आता हूँ, तो वे स्वागत नहीं करते; और यदि मैं वहाँ से कहीं चला जाता हूँ, तो कोई विदाई नहीं होती।
4
कभी जो याद भी आता हूँ मैं तो कहते हैं
कि आज बज़्म में कुछ फ़ित्ना-ओ-फ़साद नहीं
जब मैं कभी याद भी आता हूँ, तो वे कहते हैं कि आज महफ़िल में कोई शरारत या झगड़ा नहीं है।
5
अलावा ईद के मिलती है और दिन भी शराब
गदा-ए-कूच-ए-मय-ख़ाना ना-मुराद नहीं
ईद के अलावा दूसरे दिनों में भी शराब मिलती है। शराबखाने की गली का फ़क़ीर कभी मायूस नहीं होता।
6
जहाँ में हो ग़म-ओ-शादी बहम हमें क्या काम
दिया है हम को ख़ुदा ने वो दिल कि शाद नहीं
दुनिया में दुख-सुख एक साथ हों तो हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है? ख़ुदा ने हमें वह दिल दिया है जो कभी प्रसन्न नहीं होता।
7
तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँ करो 'ग़ालिब'
ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं
ग़ालिब, तुम उनसे उनके वादे का ज़िक्र क्यों करते हो? यह क्या कि तुम कहो और वे कहें कि उन्हें याद नहीं।
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