Sukhan AI
ग़ज़ल

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

ن تھا کچھ تو خدا تھا کچھ نہ ہوتا تو خدا ہوتا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 3 shers· radif: होता

यह ग़ज़ल अस्तित्व, अनस्तित्व और ईश्वर की सर्वव्यापकता से जुड़े गहरे दार्शनिक प्रश्न पूछती है। इसमें होने के बोझ, दुख के कारण संवेदनहीनता और शारीरिक पीड़ा से अलगाव को व्यक्त किया गया है। ग़ालिब अपनी हर बात पर 'यूँ होता तो क्या होता' कहने की ख़ास आदत पर भी विचार करते हैं।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
जब कुछ भी मौजूद नहीं था तब भी ईश्वर था, और यदि कुछ भी न होता तो भी ईश्वर ही होता। मेरे अपने अस्तित्व ने ही मुझे डुबो दिया है; यदि मैं न होता, तो क्या होता?
2
हुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता
जब मैं ग़म से यूँ बे-हिस हो गया, तो सर के कटने का क्या ग़म? अगर वह तन से जुदा न होता, तो घुटने पर धरा होता।
3
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता
'ग़ालिब' को मरे हुए बहुत समय हो गया है, पर वह याद आते हैं। उनकी यह आदत कि हर बात पर कहना, 'अगर ऐसा होता तो क्या होता', अब भी स्मृति में है।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.