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मैं भी रुक रुक के न मरता जो ज़बाँ के बदले
दशना इक तेज़ सा होता मिरे ग़म-ख़्वार के पास

I too would not have died by fits and starts, if instead of a tongue,my sympathizer had possessed a sharp dagger.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

अगर मेरे हमदर्द के पास जुबान की जगह एक तेज़ खंजर होता, तो मैं भी रुक-रुक कर न मरता। कवि का आशय है कि धीमी और कष्टप्रद मृत्यु से बेहतर एक तेज़ और निर्णायक अंत होता।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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