ग़ज़ल

मुँद गईं खोलते ही खोलते आँखें 'ग़ालिब'

مند گئیں کھولتے ہی کھولتے آنکھیں غالبؔ

यह ग़ज़ल प्रेम की विरह-वेदना और नियति की क्रूर विडंबना को दर्शाती है। मिर्ज़ा ग़ालिब इस बात का मर्मस्पर्शी अफ़सोस व्यक्त करते हैं कि महबूब उनके पास आया तो सही, मगर उस अंतिम क्षण में जब उनकी आँखें हमेशा के लिए मुँद रही थीं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
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मुँद गईं खोलते ही खोलते आँखें 'ग़ालिब' यार लाए मिरी बालीं पे उसे पर किस वक़्त
ग़ालिब कहते हैं कि राह देखते-देखते और खोलने की कोशिश करते हुए आखिरकार मेरी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। दोस्त महबूब को मेरे सिरहाने ले तो आए, लेकिन अफ़सोस कि किस बेवक़्त लाए जब मेरी जान जा चुकी थी।
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