ग़ज़ल

महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का

محرم نہیں ہے تو ہی نوا ہائے راز کا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: का

यह ग़ज़ल, जिसका शीर्षक "महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का" है, छिपे हुए रहस्यों और भावनाओं के प्रकटीकरण की पड़ताल करती है, यह दर्शाती है कि जो कुछ भी परदे में लगता है, वह अक्सर एक गहरी, कलात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा होता है। यह क्षणों की नाज़ुक, क्षणभंगुर सुंदरता को खूबसूरती से दर्शाती है और एक ऐसे प्रेमी के मार्मिक दुख को चित्रित करती है जिसका तीव्र दर्द आत्म-संयम से बमुश्किल समाहित है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का याँ वर्ना जो हिजाब है पर्दा है साज़ का
तुम ही रहस्यों की धुन के भेद जानने वाले नहीं हो। वरना यहाँ, जो भी परदा (अवरोध) है, वह दरअसल वाद्ययंत्र का परदा (फेट) ही है।
2
रंग-ए-शिकस्ता सुब्ह-ए-बहार-ए-नज़ारा है ये वक़्त है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-नाज़ का
मंद रंग बसंत के नज़ारे की सुबह है। यह नाज़ुक फूलों के खिलने का समय है।
3
तू और सू-ए-ग़ैर नज़र-हा-ए-तेज़ तेज़ मैं और दुख तिरी मिज़ा-हा-ए-दराज़ का
तुम अपनी तीव्र और तेज़ नज़रें दूसरों की ओर डालते हो, और मैं तुम्हारी लंबी पलकों के दुख से ग्रस्त हूँ।
4
सर्फ़ा है ज़ब्त-ए-आह में मेरा वगर्ना में तोमा हूँ एक ही नफ़स-ए-जाँ-गुदाज़ का
मेरा फ़ायदा अपनी आहों को दबाने में है, वरना मैं एक ही जान पिघला देने वाली साँस का शिकार हूँ।
5
हैं बस-कि जोश-ए-बादा से शीशे उछल रहे हर गोशा-ए-बिसात है सर शीशा-बाज़ का
शराब के जोश से शीशे इतने उछल रहे हैं कि महफिल का हर कोना शराब परोसने वाले का मुख्य स्थान बन गया है।
6
काविश का दिल करे है तक़ाज़ा कि है हुनूज़ नाख़ुन पे क़र्ज़ इस गिरह-ए-नीम-बाज़ का
मेरा दिल अभी भी मेहनत का तकाज़ा करता है, क्योंकि इस आधी खुली गाँठ का कर्ज़ अभी भी नाखूनों पर बाक़ी है।
7
ताराज-ए-काविश-ए-ग़म-ए-हिज्राँ हुआ 'असद' सीना कि था दफ़ीना गुहर-हा-ए-राज़ का
असद, मेरा सीना, जो रहस्यों के मोतियों का खज़ाना था, जुदाई के गम की काविश से लूट लिया गया।
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